Essays

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अक्षर ही दर्पण: बृहदारण्यक 5.2 और सत्य का नियंत्रित श्रवण

द-द-द प्रसंग पर। एक ही अक्षर भिन्न-भिन्न रूप से अनुकूलित मनों पर भिन्न-भिन्न रूप से उतरता है, और वही भेद ही उपदेश है।

18 min • 2026-04-24
UpanishadBrihadaranyakaPramana
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पहचान का मानदंड: संजय की आत्म-विद्या और ब्रह्म-रूप की ज्ञान-मीमांसा

संजय कृष्ण को ब्रह्म के रूप में क्यों पहचानते हैं और धृतराष्ट्र क्यों नहीं — उद्योग पर्व अध्याय 69 का ज्ञान-मीमांसक विश्लेषण।

18 min • 2026-03-06
EpistemologyMahabharataVedanta
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स्वयं मित्र और शत्रु: भगवद्गीता 6.6 का व्याकरण

एक वाक्य में पाँच 'आत्मा' एक द्वैतवादी गलत पठन को व्याकरण द्वारा असंभव बना देते हैं, कृष्णमूर्ति को स्पष्ट करते हैं, और सदियों की गलत साधना को उजागर करते हैं।

8 min • 2026-02-03
GitaConsciousnessPractice
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अनंत: मन की सुविधाजनक अतिशयोक्ति और वास्तविकता

गणितीय अनंत और वेदांत के अनंत में अंतर—वह जो सीमाओं से परे है।

10 min • 2026-01-12
ScienceVedantaPhysics
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अनुवाद का जाल: 'आत्मा' का अर्थ 'Soul' या 'Self' क्यों नहीं है?

पश्चिमी समकक्ष क्यों भटकाते हैं—उपनिषदों और गीता से शास्त्र प्रमाण के साथ।

12 min • 2026-01-12
Start HereLanguagePramana
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भक्ति और ज्ञान: दो मार्ग या दो पड़ाव?

भक्ति और ज्ञान के संबंध को समझना—प्रतिस्पर्धी मार्गों के रूप में नहीं, बल्कि मोक्ष की यात्रा के क्रमिक पड़ावों के रूप में

18 min • 2026-01-11
भक्तिज्ञानअद्वैत
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योग क्या है?

शब्द की जड़ तक जाकर, गीता और पतंजलि का समन्वय करते हुए, महासामान्य तक पहुँचना

12 min • 2026-01-11
योगगीतापतंजलि
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