अनुवाद का भ्रम
जब हम जो साक्षी है, वस्तु नहीं। को “soul” या “self” कहते हैं, तो हम ऐसे अर्थ जोड़ देते हैं जो पाठ से नहीं आते।आत्मन्
न जायते म्रियते वा कदाचित् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः
na jāyate mriyate vā kadācit nāyaṃ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ
यह न कभी जन्म लेता है, न मरता है; होकर फिर कभी न होना नहीं होता।
यह पंक्ति मन के भीतर किसी वस्तु की बात नहीं करती। यह उस साक्षी की ओर संकेत करती है जिसे देखा नहीं जा सकता।
आपत्तियाँ
- “क्या यह सिर्फ शब्दों का झगड़ा नहीं?” नहीं, गलत शब्द गलत निष्कर्ष तक ले जाते हैं।
- “परंपरा में soul शब्द आता है।” परंपरा आत्मन् कहती है, और वही निर्णायक है।
क्या बदल देगा मेरी राय
यदि कोई स्पष्ट शास्त्रीय प्रमाण आत्मन् को व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक इकाई के रूप में स्थापित करे, तो मैं दावा संशोधित करूंगा।