योग क्या है?
योग आसन या प्राणायाम नहीं—यह विशेष का सामान्य से मिलन है, महासामान्य।
‘योग’ उन शब्दों में से एक है जो हमारे कानों में गूंजता तो बहुत है, लेकिन उसका सही अर्थ हमारे मन में शायद ही कभी उतरता है। हम निश्चित रूप से तय नहीं कर पाते कि यह आखिर है क्या। अक्सर हम एक-दूसरे से ‘योगक्षेम’ पूछते हैं, कभी कहते हैं “उसका अच्छा योग (किस्मत) चल रहा है” या “उसका योग खराब है।” लोक-व्यवहार की इन बातों से लेकर ‘योगाभ्यास’ और ‘योगसिद्धि’ जैसे शास्त्रीय व्यवहार तक, इसका क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। विडंबना यह है कि हम खुद नहीं जानते कि किस समय हम इस शब्द का प्रयोग किस अर्थ में कर रहे हैं। यहाँ तक कि प्रामाणिक ग्रंथों में भी यह विषय काफी गूढ़ और अस्पष्ट सा लगता है।
गीता का बहुआयामी दृष्टिकोण
भगवद्गीता के अठारह अध्यायों को व्यास भगवान ने अठारह ‘योग’ का नाम दिया है। विचित्र बात यह है कि विषय बदलते रहते हैं, फिर भी वे हर चीज़ को ‘योग’ ही कहते हैं। ‘विषाद’ (दुःख) भी योग है, ‘कर्म’ भी योग है, और ‘ज्ञान-विज्ञान’ भी योग है। यह कैसे संभव है? महर्षि ने बीच-बीच में योग की परिभाषाएं भी दी हैं। एक जगह वे कहते हैं— योगः कर्मसु कौशलम् (कर्मों में कुशलता ही योग है)। दूसरी जगह कहते हैं— समत्वं योग उच्यते (सुख-दुःख आदि द्वंद्वों को समान भाव से देखना ही योग है)। कहीं भगवान आश्वासन देते हैं— योगक्षेमं वहाम्यहम् (योग और क्षेम दोनों मैं वहन करता हूँ)। और एक जगह तो बड़े चमत्कारिक ढंग से वर्णन करते हैं— दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् (दुःख के संयोग से वियोग हो जाना ही योग है)। वहीं, जब व्यास भगवान ज्ञानयोगव्यवस्थितिः का प्रयोग करते हैं, तो आदि शंकराचार्य (भगवत्पाद) इसका अर्थ समझाते हैं कि ‘ज्ञान’ का अर्थ है शास्त्र-जन्य ज्ञान, और उसे स्वानुभव में उतारना ‘योग’ है।
पतंजलि की सुस्पष्टता
भगवद्गीता की स्थिति ऐसी है, तो साक्षात योगशास्त्र के रचयिता महर्षि पतंजलि की बात ही क्या! षड्दर्शनों (छह दर्शनों) में कपिल का ‘सांख्य’ एक दर्शन है और पतंजलि का ‘योग’ दूसरा। सांख्य ‘निरीश्वर’ (नास्तिक) है, जबकि योग ‘सेश्वर’ (आस्तिक) है। यह अत्यंत प्रामाणिक है और बाद के पूरे योग साहित्य का मूल आधार है। उन्होंने ग्रंथ के आरंभ में ही योग का लक्षण बताया— योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। अर्थात, मन में उठने वाले सभी भावों या वृत्तियों को रोक देना ही योग है। इसे सिद्ध करने के लिए उन्होंने ‘यम-नियम’ से लेकर ‘धारणा, ध्यान, समाधि’ तक अष्टांग योग नामक आठ भूमिकाओं का वर्णन किया है।
विरोध की समस्या
जब इतने बड़े-बड़े लोग इतने अलग-अलग मार्गों से वर्णन करते हैं, तो हमें संदेह होता है कि योग का असली अर्थ आखिर है क्या। हम यह नहीं कह सकते कि ‘सब सही हैं’, क्योंकि वे परस्पर विरोधी दिखाई देते हैं। जब तक विरोध है, तब तक समन्वय (synthesis) नहीं हो सकता। समन्वय के बिना हम निश्चय-ज्ञान तक नहीं पहुँच सकते। और निश्चय-ज्ञान के बिना न साधना है, न सिद्धि। इसलिए, अब हमें विचार करना होगा कि क्या कोई ऐसा ‘समन्वय सूत्र’ है जो इन सबको एक साथ जोड़ सके।
व्युत्पत्ति: युज् धातु
किसी भी शब्द का यथार्थ समझने के लिए हमें उस मूल धातु को पकड़ना चाहिए जिससे वह बना है। ‘योग’ शब्द संस्कृत धातु युज् से बना है, जिसका अर्थ है ‘जुड़ना’ या ‘मिलना’। व्याकरण के नियमों से युज् का ज, योग में ग बन जाता है। तो योग का अर्थ हुआ—मिलन। मिलन तभी संभव है जब दो पदार्थ हों। यदि दोनों अपूर्ण हैं, तो उनके मिलने का कोई लाभ नहीं। यदि दोनों पूर्ण हैं, तो उन्हें मिलने की आवश्यकता नहीं। मिलन का अर्थ तभी है जब एक अपूर्ण हो और दूसरा पूर्ण। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते—इस मंत्र की तरह, जब यह पूर्णता को प्राप्त कर लेता है, तो मानव को उस पूर्ण तत्त्व का अनुभव होता है। यही जीवन की समस्त समस्याओं का एकमात्र समाधान है।
अपूर्ण और पूर्ण
अब प्रश्न यह है कि वर्तमान में वह अपूर्ण क्या है और वह पूर्ण तत्त्व क्या है जिसे हमें पाना है? अपूर्ण और कुछ नहीं, मनुष्य का ‘मन’ है। इस मन को दिखने वाला यह संसार भी अपूर्ण है। और तो और, इनके परे माना जाने वाला ‘ईश्वर’ भी (विशिष्ट रूप में) अपूर्ण ही है। इसका कारण यह है कि ये सब ‘विशेष’ रूप हैं। विशेष हमेशा परिच्छिन्न (सीमित) होता है। जो सामान्य (Universal) इनमें व्याप्त है, वही पूर्ण है। एक विशेष से दूसरा विशेष उत्पन्न नहीं होता; सभी विशेष ‘सामान्य’ से ही बनते हैं, उसी से भरे होते हैं और अंततः उसी में लीन हो जाते हैं। इसलिए, विशेष ‘सामान्य’ से अलग नहीं होते; सामान्य ही हमारी दृष्टि को विशेष रूप में भासित होता है। सुवर्ण और आभूषण के उदाहरण से हम इसे भली-भांति समझ सकते हैं। अतः, ‘सामान्य’ ही असली वस्तु है, विशेष तो केवल उसका आभास है। इसलिए वास्तव में कुछ भी अपूर्ण नहीं है, सब परिपूर्ण है।
त्रय और महासामान्य
वर्तमान में ‘जीव’, ‘जगत’ और ‘ईश्वर’—ये तीनों विशेष हैं, इसलिए अपनी-अपनी जगह अपूर्ण लगते हैं। जैसे, जीव ‘चिद्विशेष’ (Consciousness particularized) है और उसे दिखने वाला जगत ‘सद्विशेष’ (Existence particularized) है। ईश्वर की स्थिति बीच की है। यदि हम चिद्विशेष की बात करें तो वह जीव का पक्ष है, और सद्विशेष की बात करें तो वह जगत का पक्ष है। यदि ये तीनों विशेष हैं, तो इन सबको व्याप्त करने वाला ‘सामान्य’ क्या है?
वह है— अहमस्मि (“मैं हूँ”), वह शुद्ध स्फुरण। यह “मैं फलाना हूँ” नहीं है, इसलिए यह चिद्विशेष नहीं, बल्कि चित्सामान्य है। उसी तरह, यह “फलाना रूप में होना” नहीं है, इसलिए यह सद्विशेष नहीं, बल्कि सत्सामान्य है। तीनों को व्याप्त करने वाला सामान्य होने के कारण शास्त्रज्ञ इसे महासामान्य कहते हैं। इसी का दूसरा नाम आत्मा है। यह सच्चिद्रूप है। इसमें जीव, जगत और ईश्वर रूपी तीनों विशेष वैसे ही एक हो जाते हैं जैसे समुद्र में लहरें, बुलबुले और झाग मिलकर एक हो जाते हैं। अतः यहाँ अपूर्णता की गंध भी नहीं है। सब मिलकर एक अद्वितीय पूर्ण तत्त्व है।
समन्वय
यदि यह हमें प्राप्त हो जाए, तो बस! वही वह ‘योग’ है जो हमें चाहिए। चूँकि यह सामान्य और विशेष के एक होने की अवस्था है, यही असली समत्वम् है। इस दृष्टि से किया गया कोई भी कार्य बंधन नहीं बनता, इसलिए यही कर्मसु कौशलम् है। इसमें विशेष की वृत्तियां अपने आप विलीन हो जाती हैं, अतः यही चित्तवृत्तिनिरोधः भी है। परोक्ष रूप में यह शास्त्र-ज्ञान है, और यदि अपरोक्ष (direct experience) हो जाए तो स्वानुभव। इस पूर्ण आत्मानुभव में ‘अनात्म’ रूपी कोई अनर्थ नहीं है, इसलिए यही परम पुरुषार्थ भी है।
ब्रह्मश्री येल्लमराजु श्रीनिवास राव जी की शिक्षाओं से अनुकूलित। मूल स्रोत (तेलुगु): advaitavedanta.in