BG 2.20

BG 2.20 — न जन्म, न मृत्यु

BG 2.20
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न जायते म्रियते वा कदाचित् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः
na jāyate mriyate vā kadācit nāyaṃ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ
यह न जन्म लेता है, न मरता है; होकर फिर कभी न होना नहीं होता।

यह श्लोक साक्षी को वस्तु मानने की भूल रोकता है। शरीर नहीं, साक्षी जन्म-मृत्यु से परे है।

अर्थ

अनुभव के पीछे साक्षी को स्थिर रखें। यह शरीर की अमरता का दावा नहीं करता।

अभ्यास

तीन मिनट शांत बैठें। विचारों की धारा देखें। पूछें, “इसे कौन जानता है?”