Daily — 2026-01-05
BG 2.20
श्लोक — BG 2.20
न जायते म्रियते वा कदाचित् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः
na jāyate mriyate vā kadācit nāyaṃ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ
यह न जन्म लेता है, न मरता है; होकर फिर कभी न होना नहीं होता।
यह कथन शरीर के बारे में नहीं है। यह उस साक्षी के बारे में है जो कभी वस्तु नहीं बनता।
एक शब्द — आत्मन्
आत्मन् साक्षी का नाम है, कोई निजी व्यक्तित्व नहीं।
एक प्रश्न
जब अनुभव की सारी वस्तुएं अलग कर दी जाएं, तब क्या रहता है?